0 comments Monday, August 18, 2008

कुछ चाहतें, कुछ सपने लेकर संग हम चलें
आयो मिलकर जीवन में नए रंग हम भरें

इस बार की बसंत सिर्फ पीली नहीं होगी
मन कामना की तरंग से अधीर भी होगी
सुन कुंवारे मन को तेरी चंचलता ऐसी भाये
शब्दकोष के सारे शब्द तेरे रूप गुण गाये
प्रियतम को गले लगाकर हर शाम यू ढले
कुछ चाहतें, कुछ सपने लेकर संग हम चलें

कोई दीवाना या कोई प्रेमी जैसी मनोदशा
मुझमें तेरे योवन का कुछ ऐसा है नशा
तू उर्वशी सी बनी घूमती मेरी आँखों को भाये
बिन बोले ही इन होंठों से मधुर गीत सुनाये
अतृप्त वेदना की अग्नि में तन मेरा यूँ जले
कुछ चाहतें, कुछ सपने लेकर संग हम चलें

0 comments Wednesday, August 6, 2008

दिन भर इन लम्हों के संग
रोज़ एकेले लड़ती हूँ
मिलते हो तुम रोज़ समय से
फिर क्यों खालीपन से डरती हूँ

कमरे के उस झरोखे से
रोज़ परिंदे हंसते हैं
लहराते से इन हवायो में
हरे भरे तरू दीखते हैं
मैं लाखो सपने मन में समेटे
पन्नो से बाते करती हूँ
फिर क्यों
खालीपन से डरती हूँ

बहुत दिनों से सोयी नहीं मैं
इसी श्रृंखला के बंधन में
वक़्त गति पर डाळ बेडियाँ
उड़ता सीमाहीन क्षितिज में
मैं भोग विलास में डूबी
जीवन डोर झूलती हूँ
फिर क्यों
खालीपन से डरती हूँ

आँख मिचोनी रोज़ खेलती
इन अधूरे शब्दों के साथ
कभी निकल कर इस माया से
उड़ जयूंगी पंख पसार
तुम साथ हो, रंग भी मेरे
मन-तुलिका चित्र बनती हूँ
फिर क्योंखालीपन से डरती हूँ.......