0 comments Wednesday, July 23, 2008

मैं धुयाँ धुयाँ सा होकर कभी
पर्वत संग इतरायूं
कभी घटा सी बनकर काली
हरियाली लेकर आयूं
मुझमें भर जाये रंग कोई ऐसे
जो वतन मेरे पर छाए
लाल हरा नीला पीला
दिलों पर बरस जाये

कभी तबस्सुम बनकर में
चहरो पर खिल जायूं
कभी सूर्य की प्रभा बनी मैं
हर मन में सिमट जायूं
मुझको मिल जाये ऐसे पल जो
देश हित में जाये
सेवक बनू या सैन्य कठोर
ध्वज देश का लहराए...

कभी पत्थर बनकर एक अमर
सेतु बड़ा बनायूं
जिसपर चलकर आगे उसको
चाँद तक ले जायूं
मुझमें भर जाए ऐसा साहस
कवी मन से तकरायूं
जन गन मन करती कलम यह
लोगो तक पहुचायूं......

जय हिंद!! जय भारती!!
--श्रुति

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फिर निकली हूँ उस राह पर
तेरे द्वारे जो पहुंचाए
लेकिन चलते चलते सोचूं
सांझ न ढल जाये

कोई ऐसा पल नहीं था
गंध तेरी न मुझको आये
फिर खोजते तेरे नैन
क्युओं आँखें मेरी पथराये

ये कैसी मृगतृष्णा है मेरी
जिसकी तृष्णा नहीं भरी
मुग्ध भाव से पिया जो मैंने
तृप्ति वाली बूँद कहीं?

इस चंचल मन की स्मृतियाँ
रोज़ मुझे बहकाती है
फिर धुंधली सी झांकी दिखलाने
उसी पथ पर ले जाती है

मुझको फिर से मुड़ना होगा
आगे हो गया है अन्धकार
जो विचार थे आये मन में
देना होगा उनका बलिदान ....

मैं असमंजस सी लौटी वापिस
अपने इसी साधना पथ पर
श्वासों की गहराइयों में
सफ़र की निशानी रथ पर

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मेरे देस का चाँद तनहा हो रहा है
छोड़ के देश हर कोई बेगाना हो रहा है

रात भर जो राह तकते गुजरती है उसकी
भटके कारवां में नाम दीवानों का हो रहा है
मेरे देश का चाँद........

जो कभी देखता था वो जानूने वफ़ा तुझमें
बेवाफाओ की महफिल में खुश हो रहा है
मेरे देश का चाँद......

अब तो जी घबराता है उसका भी निकलने में
महिवाल की सोहनी को खुद पे गुमान हो रहा है
मेरे देश का चाँद......