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Wednesday, July 23, 2008
मैं धुयाँ धुयाँ सा होकर कभी
पर्वत संग इतरायूं
कभी घटा सी बनकर काली
हरियाली लेकर आयूं
मुझमें भर जाये रंग कोई ऐसे
जो वतन मेरे पर छाए
लाल हरा नीला पीला
दिलों पर बरस जाये
कभी तबस्सुम बनकर में
चहरो पर खिल जायूं
कभी सूर्य की प्रभा बनी मैं
हर मन में सिमट जायूं
मुझको मिल जाये ऐसे पल जो
देश हित में जाये
सेवक बनू या सैन्य कठोर
ध्वज देश का लहराए...
कभी पत्थर बनकर एक अमर
सेतु बड़ा बनायूं
जिसपर चलकर आगे उसको
चाँद तक ले जायूं
मुझमें भर जाए ऐसा साहस
कवी मन से तकरायूं
जन गन मन करती कलम यह
लोगो तक पहुचायूं......
जय हिंद!! जय भारती!!
--श्रुति

