1 comments Friday, January 18, 2008

जिस मोड़ से शुरू किया था, हमने वो सफ़र
खनक सदा गूंजेगी उसकी बनके गंगा जल

एक महकती बेला प्यार की, योवन के जब द्वार चदे
फूल छिटक कुछ संकोचो के, बाजूबंद की शान बने
लेकिन याचक बन ने से पहले, बंद हुए ये अधर
खनक सदा गूंजेगी उसकी बनके गंगा जल

प्रेम पपीहा आँगन में मेरे, मनमीत तुझे बुलाये
वो शब्द वादियों से टकराकर, स्वर मधुर कर जाए
लेकिन रोये साथ बैठ कर, आये ऐसे भी पल
खनक सदा गूंजेगी उसकी बनके गंगा जल

जो कांटे है राहों मैं तेरी, कैसे अब चुग पायू
तुने बदला रास्ता अपना, कैसे पलक छाया लायू
तू आएगा फिर से मुड़कर, इन गीतों मैं कल
खनक सदा गूंजेगी उसकी बनके गंगा जल

जिस मोड़ से शुरू किया था, हमने वो सफ़र
खनक सदा गूंजेगी उसकी बनके गंगा जल ............

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कितने रिश्ते पहचान देते हमको, खुद के अस्तित्व के मायने रखते है

चंद ख्वाहिशे दामन में लेकर, जिंदगी भर फिर रिश्ते सुलझाते है

जो रंजिशे दिलों में है बाकी , बातो के तीर चलाते है

सम्मान नहीं कर सकते किसी का, और आँगन में तुलसी लगाते है

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तुझसे बिछुड़ने का सदमा नहीं है मुझे

तेरी वफायो का सदमा लगता है


तनहइयो में तो सो लेते है

तेरी मुलाकातों में सदमा लगता है


झगदो में तो प्यार झलकता

प्यार की बातो का सदमा लगता है


हम जाम पिए आन्सुयो के कोई बात नहीं

माधहोशियो का सदमा लगता है


वक़्त की लहरों पर किश्ती है मेरी

सहिलो पर जाने का सदमा लगता है


मैं छू तो लू उड़ कर आसमान

चाँद सितारों का मगर सदमा लगता है

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