कुछ चाहतें, कुछ सपने लेकर संग हम चलें
आयो मिलकर जीवन में नए रंग हम भरें
इस बार की बसंत सिर्फ पीली नहीं होगी
मन कामना की तरंग से अधीर भी होगी
सुन कुंवारे मन को तेरी चंचलता ऐसी भाये
शब्दकोष के सारे शब्द तेरे रूप गुण गाये
प्रियतम को गले लगाकर हर शाम यू ढले
कुछ चाहतें, कुछ सपने लेकर संग हम चलें
कोई दीवाना या कोई प्रेमी जैसी मनोदशा
मुझमें तेरे योवन का कुछ ऐसा है नशा
तू उर्वशी सी बनी घूमती मेरी आँखों को भाये
बिन बोले ही इन होंठों से मधुर गीत सुनाये
अतृप्त वेदना की अग्नि में तन मेरा यूँ जले
कुछ चाहतें, कुछ सपने लेकर संग हम चलें
Monday, August 18, 2008
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