दिन भर इन लम्हों के संग
रोज़ एकेले लड़ती हूँ
मिलते हो तुम रोज़ समय से
फिर क्यों खालीपन से डरती हूँ
कमरे के उस झरोखे से
रोज़ परिंदे हंसते हैं
लहराते से इन हवायो में
हरे भरे तरू दीखते हैं
मैं लाखो सपने मन में समेटे
पन्नो से बाते करती हूँ
फिर क्यों
खालीपन से डरती हूँ
बहुत दिनों से सोयी नहीं मैं
इसी श्रृंखला के बंधन में
वक़्त गति पर डाळ बेडियाँ
उड़ता सीमाहीन क्षितिज में
मैं भोग विलास में डूबी
जीवन डोर झूलती हूँ
फिर क्यों
खालीपन से डरती हूँ
आँख मिचोनी रोज़ खेलती
इन अधूरे शब्दों के साथ
कभी निकल कर इस माया से
उड़ जयूंगी पंख पसार
तुम साथ हो, रंग भी मेरे
मन-तुलिका चित्र बनती हूँ
फिर क्योंखालीपन से डरती हूँ.......
Wednesday, August 6, 2008
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