मैं धुयाँ धुयाँ सा होकर कभी
पर्वत संग इतरायूं
कभी घटा सी बनकर काली
हरियाली लेकर आयूं
मुझमें भर जाये रंग कोई ऐसे
जो वतन मेरे पर छाए
लाल हरा नीला पीला
दिलों पर बरस जाये
कभी तबस्सुम बनकर में
चहरो पर खिल जायूं
कभी सूर्य की प्रभा बनी मैं
हर मन में सिमट जायूं
मुझको मिल जाये ऐसे पल जो
देश हित में जाये
सेवक बनू या सैन्य कठोर
ध्वज देश का लहराए...
कभी पत्थर बनकर एक अमर
सेतु बड़ा बनायूं
जिसपर चलकर आगे उसको
चाँद तक ले जायूं
मुझमें भर जाए ऐसा साहस
कवी मन से तकरायूं
जन गन मन करती कलम यह
लोगो तक पहुचायूं......
जय हिंद!! जय भारती!!
--श्रुति
Wednesday, July 23, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


0 comments:
Post a Comment