फिर निकली हूँ उस राह पर
तेरे द्वारे जो पहुंचाए
लेकिन चलते चलते सोचूं
सांझ न ढल जाये
कोई ऐसा पल नहीं था
गंध तेरी न मुझको आये
फिर खोजते तेरे नैन
क्युओं आँखें मेरी पथराये
ये कैसी मृगतृष्णा है मेरी
जिसकी तृष्णा नहीं भरी
मुग्ध भाव से पिया जो मैंने
तृप्ति वाली बूँद कहीं?
इस चंचल मन की स्मृतियाँ
रोज़ मुझे बहकाती है
फिर धुंधली सी झांकी दिखलाने
उसी पथ पर ले जाती है
मुझको फिर से मुड़ना होगा
आगे हो गया है अन्धकार
जो विचार थे आये मन में
देना होगा उनका बलिदान ....
मैं असमंजस सी लौटी वापिस
अपने इसी साधना पथ पर
श्वासों की गहराइयों में
सफ़र की निशानी रथ पर
Wednesday, July 23, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


0 comments:
Post a Comment