मेरे देस का चाँद तनहा हो रहा है
छोड़ के देश हर कोई बेगाना हो रहा है
रात भर जो राह तकते गुजरती है उसकी
भटके कारवां में नाम दीवानों का हो रहा है
मेरे देश का चाँद........
जो कभी देखता था वो जानूने वफ़ा तुझमें
बेवाफाओ की महफिल में खुश हो रहा है
मेरे देश का चाँद......
अब तो जी घबराता है उसका भी निकलने में
महिवाल की सोहनी को खुद पे गुमान हो रहा है
मेरे देश का चाँद......
Friday, July 18, 2008
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1 comments:
बढिया!
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