Thursday, June 12, 2008

मैंने देखा है समुंदर को पाँव से नापते हुए
सपनो में ही सही, मेरी तमन्नाएं आज भी जीवित हैं
तुम रुख कर गए अगर हवायो के साथ तो भी क्या
मैंने शाम को पंछी वापिस आते देखा है...

जो कभी छलके आँख से, ऐसे मोती यहाँ नहीं मिलते
उस बाजार में बिकने वाले और बहुत हैं
यह मुस्कुराहते काम न आये किसी के तो भी क्या
एक दिन की खिलखिलाहट के लिए ये कहाँ सीमित हैं...

तन्हाई के जंगल से कभी हम भी गुजरे थे
वहाँ की फिज़यों में फरमाइश बहुत है
हम घिर जाये फिर से उन फर्मैश्यो से तो भी क्या
आज साथ में तेरे प्यार की दौलत बहुत है......

1 comments:

संदीप said...

आपने ब्‍लॉग की दाहिनी ओर सबसे ऊपर लाजवाब पेंटिंग लगा रखी है, यदि जानकारी हो तो बताएं कि यह किसकी पेंटिंग है...

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