जब से भारत छोड़ कर यहाँ अमेरिका में आकर बसी हूँ, तब से महसूस करती हूँ की सच में अपने देश से दूर बसे हुए भारतीये आज भी उतने ही दिल से अपने देश के लिए प्यार रखते होंगे, जितना आज मैं महसूस कर रही हूँ.. सब कुछ नया है.. नया देश.. नए लोग.. नयी सभ्यता.. जितना मैं इन लोगो के बीच खुद को adjust करने में लगी हूँ, उतना ही अपने देश के लिए अन्दर से तड़प महसूस करती हूँ
यहाँ की गर्मियाँ और भारत की गर्मियों में बहुत अंतर है..सूरज वैसे ही अपनी आभा बिखरता हुआ आता है और ढल जाता है. लेकिन वो तपिश और फिर वो शाम को ठंडी हवा नहीं महसूस होती, जो की सिर्फ अपने घर की छत पर शाम ढले ठंडे पानी के छिरकाव के बाद मन के रोम रोम में बस जाती थी.. वो बिजली का चले जाना और गली में बच्चो का शोर और हम सभी ने छत पर बैठ कर पुराने हिंदी गाने गा के मज़े लेने.. और हाँ.. याद है?? वो जब छत पर सोये होना और गर्मी से बेहाल होना, तभी एका एक बारिश का आना और सरपट बिस्तर समेत कर नीचे भागना..और वो भीगी मिटटी की खुशबू शायद कभी इस दिल से जुदा नहीं हो सकतीजो शरीर के हर अंग में नया जोश पैदा कर देती थी..... बारिश यहाँ भी होती है.. धरती यहाँ भी गीली होती है, लेकिन कभी आपने देश की मिटटी की तरह खुशबू नहीं आती..आती है तो बस बरसात और उस से होने वाली ठंड.. वो पंछी नहीं, वो हवा नहीं न ही अपनों के प्यार की छाव..:(
लोग फिर भी यहाँ एकेलेपन में जिए जा रहे है... हर कोई बस पैसे की चाह में अपनों से दूर होता जा रहा है..कुछ पंक्तियाँ इसपर गुनगुनाना चाहूंगी....
हम खुद को मुकम्मल करने के लिए
मुकम्मल जहाँ छोड़ आये
सिलवटें निकलते निकलते
कुछ रिश्तों को मरोर आये..
तू चल वही पर जो तेरी सर ज़मीं है
यहाँ पर न अपनों की डोर हाथ आये.....
Thursday, May 22, 2008
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2 comments:
अच्छा लिखा है।
साफ सुथरी और संवेदनपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए बधाई.सिलसिला बनाए रखें. शुभकामनाएं.
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