Thursday, May 8, 2008

आज जाग लूं उस निद्रा से
जिसमें गंध, फूल है और जवानी
ऐसे ही सब मुझे छेड़ते
सब बोले हैं एक ही वाणी

मुझे जो कभी तुम पहचानो
मैं रंगो में लाल रंग हूँ
तुम पीते हो ऐसे मुझको
जैसे हूँ कोई शराब पुरानी

मुझ मैं तुम हो तुझ में मैं
फिर आँखों की पहचान यह कैसी
सुबह होते ही खो देती हूँ
महक कभी ये रात की रानी

चुपके से देखो चेहरे को
कोई आँखों में बसता है
मैं जीवन भर की संगिनी तेरी
होगी न यह कभी कहानी

देखो अब यह सपने कैसे
पाँव पसारे जाते हैं
हर मौसम मैं मेरे आँगन
तेरे ही प्यार की छाव सुहानी

1 comments:

Imran Jalandhari said...

बहुत खुब श्रुति जी आपका जवाब नहीं, आपकी जितनी तारीफ की जाए कम है... आपकी तरह आपकी कविताएं भी बहुत खूबसूरत हैं।

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