चंद बातें उठती है,
तेरी महफिल में आने के बाद
मैं चुप रहूँ या मुस्कुरायूं
अब इसका कोई अर्थ नहीं
कुछ इस कदर वहाँ माहौल बना
पूजा ही पीडा का जाम बना
मैं नमन करूं या किकोल करूं
अब इसका कोई अर्थ नहीं
प्रश्न पूछे गए बार बार
कटु वाक भी सुनाये गए
मैं उत्तर बनू या अर्पण करूं
अब उसका कोई अर्थ नहीं
शब्दों का प्रहार हुआ
अर्थो से न व्यवहार हुआ
तुम चर्चा करो या मैं निरूतर
अब उसका कोई अर्थ नहीं
मैं जो हूँ वो मुझे पता है
दर्पण मन के पास पड़ा है
मैं सीखूँ या तुम सिखलायो
अब उसका कोई अर्थ नहीं
इस समय के तेज बहाव में
हम सब यूँ ही बह जायेंगे
तुम साथ बढो या ठुकरायो
सच मैं
अब उसका कोई अर्थ नहीं.....
Monday, March 31, 2008
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1 comments:
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