स्वपन रात में जिस्म की जो
गंध बिखरेगी कभी
प्राण उसमें खोकर मुझको
महसूस करोगे कभी?
गंध बिखरेगी कभी
प्राण उसमें खोकर मुझको
महसूस करोगे कभी?
जब कभी यूँ अड्चानो में
धीर बहता जल सा होगा
बाँध आलिंगन में मुझको
स्वपन सुनहरा देना होगा
मोहमाया के बस में होकर
जागेगी इच्छाएं कभी
प्रिये! क्या उन पलों में
जल सकोगे संग कभी ?
मेरे घर के अंगना में
मेघ विरह के जब जब छाए
मचल कर ये पुष्पित मन
वीराने में भी खिलता जाये
जानती हूँ ओ सांझ सखा
तुम दूर खडे मुस्कुराते हो
फिर भी क्या मेरे स्वरों पर
तान भीगेगी कभी?
हम दोनों भिन्न बहुत हैं
इक जल और इक है बाती
फिर भी ओ भोले पंथी
बन जाना तुम जीवन साथी
जब चाँद की झीनी चादर
ढक जायेगी मुख पर कभी
वादा करो उस चांदनी की
लाज छूटे न कभी
स्वपन रात में जिस्म की
जो गंध बिखरेगी कभी
प्राण उसमें खोकर मुझको
महसूस करोगे कभी?........................
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