मैं , अनछुई सी
कितने रंगो से सरोबार होकर
बार बार आज कल
खुद को आइने में देखती हूँ
मैं , देखती हूँ
मुझमें जो यह रंग चड़ा है
बिना भिगोए मुझको
उन विश्वासों का है
मुस्कुराहतो का है
जो अजनबी आज आके
मेरे द्वारे खडा है..
मैं, सुनती हूँ
उन गीतों को, जिनमें प्रेम का भाव नहीं
जब समझी उन बोलो को
कैसे कहूं कोई अरमान नहीं
शाम ढलते ढलते
जो नींदे चुराता है
अपनी बातो कि महक से
मेरा कमरा सजाता है
हाँ पर अब ये समझ आ गया
मैं अनछुई नहीं रही
छु लिया उसने
इस दिल कि उठती उमंगो को......
Wednesday, March 12, 2008
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