Tuesday, February 5, 2008

एक नज़र जो खुद पर डाली
प्रेम के रंग में डूबा पाया
हर कोई कैसे चाहे मुझसे
संबंधो की झूठी काया

मुझमे जो है, तुम क्या जानो
गूंगे हृदय को न पहचानो
मैं गुंजन हूँ उस भवरे की
डाल डाल पर जो भरमाया

समय बड़ी अजीब चीज है
रिश्ते भी मुरझाते है
कहने वाले फिर भी पूछे
बता! कौन है तेरा सरमाया

बुझते मन से कैसे बोलूं
मैं निशा की जोत रूहानी
निरंतर जलती रहती हूँ अंदर
औरो को मिलता उजियारा!!!!!!

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