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Wednesday, October 31, 2007
राह पर चलते चलते मुझको ये ख्याल आया
क्यों नही साथ चल रहा मेरे, मेरा ही साया
वादा किया था उसने
मैं साथ ही रहूंगा
तु जब तक चलेगी
मैं राहें थाम लूंगा
फ़िर क्यों आज ज़िन्दगी में
खुद को अकेले खड़े पाया
राह पर चलते..................
जो समझी मैं आज अभी अभी
धूप छांव की ये दुनिया बनी
जब मैनें ये सवाल उठाया
बादलों से खुद को घिरे पाया
राह पर चलते..................


