0 comments Wednesday, October 31, 2007

राह पर चलते चलते मुझको ये ख्याल आया
क्यों नही साथ चल रहा मेरे, मेरा ही साया
वादा किया था उसने
मैं साथ ही रहूंगा
तु जब तक चलेगी
मैं राहें थाम लूंगा
फ़िर क्यों आज ज़िन्दगी में
खुद को अकेले खड़े पाया
राह पर चलते..................
जो समझी मैं आज अभी अभी
धूप छांव की ये दुनिया बनी
जब मैनें ये सवाल उठाया
बादलों से खुद को घिरे पाया
राह पर चलते..................

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एक तैयारी, एक सवारी
एक समंदर पार हुआ है..
अब न घबरा मन तू मेरे
ज़िन्दगी का आज आभास हुआ है..


एक जवानी, एक कहानी
एक इन्सान किरदार हुआ है
तू जो कह देता था हसकर
तुझसे घर आबाद हुआ है.....


एक तमन्ना, एक नसीब
सपनों का आगाज हुआ है
बन्द करके बैठी जो आंखे
हर अपना नाराज़ हुआ है..........


एक तन्हायी, एक पुरवाई
फ़िर मौसम का साथ हुआ है
झुक जयेगी हर वो मुश्किल
साजन जो तेरे पास हुआ है........