Friday, December 21, 2007

ओ प्रिये,
तुम योवन के पलों में देखो
गीत पुराना गाते हो
नयन सेज पर मेरे कभी
काजल सा बिखर जाते हो
कुछ अतृप्त मेरे होंठो पर
मधुकर बन कर आते हो
फिर प्रेम विष पीने की मुझमे
इच्छा क्यों जागते हो !

ये मन मौसम सा चंचल
तुम मेघदूत बन जाते हों
स्वप्न स्वर्ग में बाहें पसारे
आँचल में छिप जाते हों
तपती धूप में मुझको तुम
चन्दन सा महकाते हो
फिर मन मधुबन का कोई पंछी
बनकर गीत सुनाते हो


प्रेम समर्पण मेरा ऐसा
बस धीरे से मुस्काते हो
शूल सी जब होती वाणी
दर्पण मुझे दिखाते हो
वादों का सिन्दूर भरकर
वधू अपनी बनाते हो
विनोदमय से सजल चितवन में
फिर सांसो के झूल झुलाते हो



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1 comments:

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