Thursday, November 1, 2007

अनुरागी(devoted) मन, ढूढ्ने निकला
प्रेम की नय्या पर हो सवार
प्रारब्ध(destiny) की रेखा यूं खिचं गयी
असफ़ल हो गया हर प्रयास...

बन्धन ऐसे मोह माया के
हर एक में दिखता स्वार्थ
अकेले ही जब तप करने बैठी
अन्तर मन में उठे सवाल.....

अवलोकन फ़िर हुआ जो मन का
कैसे कैसे द्वार खुले
आतीत की परतें पर छुपे हुए
चेहरों के अभिज्ञान हुए

उस चेहरे के रंग में डूबी
ऐसा मेरा श्रंगार हुआ
फ़िर मौसम कुछ ऐसे बदले
घुलते गये अरमान मेरे

सोच में बैठ कर रैन बितायी
जाने कब होगी प्रभात
आगे सफ़र पर है निकलना
ढ़ूढ़्ना है फ़िर से आधार
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1 comments:

Gita pandit said...

वाह....क्या बात है....
अपकी लेखनी बहुत बोल रही है...

शुभ-कामनाएं

श्रुति जी
बधाई

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