Wednesday, November 28, 2007

तपस तन की, तपस मन की
तपस से हर शाम जले
तुम क्या समझोगे प्रियवर
वेदनायों के ख्वाब भले

तुम जो कभी कुछ कहते थे
मैं मंत्रमुग्ध सी सुनती थी
तेरी बातों के शब्दों को
मैं गीतों में बुनती थी
उन गीतों के सात सुरो में
अब विरह के राग भरे
तुम क्या समझोगे प्रियवर..............

एक नन्हा सा आंसू कभी
तेरे नैन झुकाता था
मैं पलकों पर लाख दुआयें
मुस्कानों की लाती थी
उन पलकों के भीगे द्वार पर
मुक्ती के अब प्राण पले
तुम क्या समझोगे प्रियवर..........

तेरे मिलने की आशा में
आज भी दीप जलाते है
रस्ता रस्ता जिधर से गुजरे
नैनों से फूल गिराते हैं
इस चहरे पर मुड़्कर देखो
जीवंत कोई साझं ढ्ले
तुम क्या समझोगे प्रियवर
वेदनायों के ख्वाब भले ........................


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2 comments:

Anonymous said...

There is no word to express your imagination

रिपुदमन said...

बहुत ही सधि हुई कविता है .... बहुत बढ़िया लिखा है तुमने.....
सदा अच्छा अच्छा लिखती रहो .......

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