Friday, November 16, 2007


भला क्यों पूछते हो मुस्कुराकर दास्तां मेरी

मेरे चेहरे पे फूलों सा तब्बसुम क्या नहीं भाता

ये देखो शाम से चेहरे हैं डूबे सोच में सारे
हमें अपनों से नाता भी निभाना क्यों नहीं आता

ये वादा था बहारों से मैं आऊंगा यहाँ लेकिन
मैं आऊं तो सुहाना कोई मंज़र क्यों नहीं भाता

करा क्यों ज़िक्र तूने महफ़िलों में हर कहीं मेरा
तुम्हें छोटा सा अफ़साना भुलाना क्यों नहीं आता

थिरकती रात में हैं लड़खड़ाते मयकदे कितने
नशीली आँख वाला जाम मुझको क्यों नहीं भाता

-रिपुदमन पचौरी

तेरे आशीष से माते ये लीला हो रही है
निरंतर लेखनी सृजन-शीला हो रही है!

0 comments:

Post a Comment