Thursday, August 23, 2007






जो लिखा, तन्हायी का ही लिखा
ऐसा कह्ते हैं वो तन्हा छोड़ने के बाद
हमने भी की थी कभी वफ़ाऐं
जिक्र उनका भी करो बेवफ़ाई के बाद......
जो लिखा, तन्हायी का ही लिखा....................

हर मौसम एक सा नहीं रहता
बहार आती ही है सदा
पतझड़ के बाद.
दो रंगो में क्यों देख रही हो दुनिया
सात रंग दिखते ही हैं
बरसातों के बाद.......
जो लिखा, तन्हायी का ही लिखा............................

"रोना नहीं मुझसे बिछुड़ के कभी तुम
"बोलते हैं दर्द देने के बाद"
समेट लो खुशियाँ दामन में
अपने दिल से मुझे निकालने के बाद.....
"जो लिखा, तन्हायी का ही लिखा...................

इससे ज्यादा और क्या लिखूँ
तेरे सजदे में सर झुकाने के बाद
हंसते रहेंगे, तुम जो कहोगे मुझसे
आँसुओं को पलकों में छुपाने के बाद..
जो लिखा, तन्हायी का ही लिखा............................

2 comments:

ख्वाब है अफसाने हक़ीक़त के said...

बहुत खूब लिख है श्रुति आपने..

हर मौसम एक सा नहीं रहता
बहार आती ही है सदा
पतझड़ के बाद.
दो रंगो में क्यों देख रही हो दुनिया
सात रंग दिखते ही हैं
बरसातों के बाद.......
जो लिखा, तन्हायी का ही लिखा............................

आपकी रचना का एक-एक शब्द दिल को छू जाता है ! हमे खुशी है कि जहाँ एक ओर लिखने वालो की भीड बढती जा रही है वहाँ आप जैसे लिखने वाले अपने एक अलग और ऊँचे मुकाम पर है ! और हमे इतनी खूबसूरत रचनाये पढने को मिल रही है !
बहुत खूब !!!
--- दीपक गोगिया

Anonymous said...

GOOD WRITTEN SHRUTI, KEEP IT UP!!!

MOHIT

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