Tuesday, August 7, 2007


कुछ ही बातें … बहुत छोटे की यादें ….जो स्मृति पटल पर लिखी हुईं सुनहरे पलो की याद दिलाती हैं। उस के बाद के वर्षो की यादें कुछ अधिक रुचि पूर्ण और अच्छी नहीं हैं सो उनकी बात न करके कुछ जो मन को अभी तक प्रसन्न करता है वह बताता हूँ।
मै… करीबन … ३ साल का रहा हुआ होंगा।अब सवाल यह है कि मुझे कैसे पता कि मैं ३ साल का ही था।यह बात मैं ऐसे स्पष्ठ कर कर सकता हूँ क्योंकि मैंने ४ साल से कुछ कम उम्र में स्कूल जाना शुरु किया था।और जिस समय की मैं बात कर रहा हूँ उस समय मैं स्कूल नहीं जाता था। और कद कुछ दो - ढ़ाई फ़ीट रहा होगा।क्योंकि मैं कम्ज़ोर था, सो रोता रहता था। माँ के पास आ जाया करता ( जो की सदा ही व्यस्त रहती थीं। छोटे छोटे बच्चे हों तो काम तो अधिक रहता ही होगा। जब की वो एक कामकाजी महिला थीं)। माँ, रसोई में खाना पका रही होती थीं, मैं उनका घुटना पकड कर.. लिपट कर… अकसर ठुन-ठुनाया करता था। कभी भूख के कारण .. कभी व्यर्थ ही शायद। फ़िर बार बार उनका पल्लू खीन्चता..उनको पुकारता....इस पर माँ गोदी में उठा कर, रसोई की स्लैब बर बिठा देतीं थीं। फ़िर अपना काम करते करते कहतीं कि “तुम रोना नहीं.. मैं तुम को गाना सुनाऊँगी….ठीक है..”….यह कह कर वे.. मेरे छोटे छोटे से हाथों मे. कुछ मखाने और किश-मिश रख कर फ़िर कुछ गुन्गुनाती और मुझे कोई गाना सुनाया करतीं। अकसर वो जो गाना गुन-गुनाती थीं …वो था…”ओ मैं तो छोड चली बाबुल का देस… पिया का घर प्यारा लगे…… “। जब भी माँ वो गाना गाती थीं तो तब मुझे लगता .. कि मम्मी को नाना जी की याद आ रही है … (जैसे मुझे उस समय अपने पापा की आ रही है)। बच्चा था…शब्द ज्ञान अधिक नहीं था सो ..”पिया” का मतलब — “पापा” समझता था, इसलिये बाद में जाकर समझ में आया … कि वह उनके पापा के बारे में बात नहीं हो रही थी बलकी मेरे पापा के बारे में हो रही थी

अब यह सब याद करके बहुत हंसी आती है।


रिपुदमन पचौरी

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