Monday, July 30, 2007


ढूढंती फ़िर रही आज फ़िर से वाजूद को
तेरी अभिलाशयो में जो खो बैठी थी
इस अन्नय जीवन का तू बना व्यपारी
दिल का दाम देकर लूट बैठा था.....
तेरी अनुकम्पायों के दिये जो जले
मैं खुद को रोशनी समझ बैठी थी
जुदा कर दिया खुद से फ़िर ऐसे
कलम से कुछ गलत लिख बैठा था.....
देखा फ़िर से आईना जो उठा के
खुद से ही स्वाल कर बैठी थी
समेट दिया मुझको यूं पन्नों में
जैसे शब्दो को गिन बैठा था.....

ढूढंती फ़िर रही.....................

2 comments:

sunil said...

Hi Shruti,

I have gone thru your poems & these are really nice specailly the "Bachpan wali" and wish you all the best for your future poems. Do keep in touch....

Thanks...Sunil Vyas

Anonymous said...

GOOD WRITTEN SHRUTI, KEEP IT UP

MOHIT

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