ढूढंती फ़िर रही आज फ़िर से वाजूद को
तेरी अभिलाशयो में जो खो बैठी थी
इस अन्नय जीवन का तू बना व्यपारी
दिल का दाम देकर लूट बैठा था.....
तेरी अनुकम्पायों के दिये जो जले
मैं खुद को रोशनी समझ बैठी थी
जुदा कर दिया खुद से फ़िर ऐसे
कलम से कुछ गलत लिख बैठा था.....
देखा फ़िर से आईना जो उठा के
खुद से ही स्वाल कर बैठी थी
समेट दिया मुझको यूं पन्नों में
जैसे शब्दो को गिन बैठा था.....
ढूढंती फ़िर रही.....................
तेरी अभिलाशयो में जो खो बैठी थी
इस अन्नय जीवन का तू बना व्यपारी
दिल का दाम देकर लूट बैठा था.....
तेरी अनुकम्पायों के दिये जो जले
मैं खुद को रोशनी समझ बैठी थी
जुदा कर दिया खुद से फ़िर ऐसे
कलम से कुछ गलत लिख बैठा था.....
देखा फ़िर से आईना जो उठा के
खुद से ही स्वाल कर बैठी थी
समेट दिया मुझको यूं पन्नों में
जैसे शब्दो को गिन बैठा था.....
ढूढंती फ़िर रही.....................



2 comments:
Hi Shruti,
I have gone thru your poems & these are really nice specailly the "Bachpan wali" and wish you all the best for your future poems. Do keep in touch....
Thanks...Sunil Vyas
GOOD WRITTEN SHRUTI, KEEP IT UP
MOHIT
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